GPM: मौत का सौदागर बना निजी अस्पताल का संचालक! दो मासूम जिंदगियों की लाश पर चल रहा ‘मैनेजमेंट’ का गंदा खेल
DD अस्पताल पर मौतों का साया: इलाज के नाम पर लाखों की डकैती, तीमारदारों को गुमराह कर ली दो महिलाओं की जान

गौरेला-पेण्ड्रा-मरवाही |जीपीएम।इंसानियत को शर्मसार और रूह को कंपा देने वाली एक ऐसी सनसनीखेज दास्तान सामने आई है, जिसने पूरे गौरेला-पेण्ड्रा-मरवाही जिले को झकझोर कर रख दिया है। सेमरा तिराहा स्थित ‘डीडी अस्पताल’ (DD Hospital) अब मरीजों के लिए जीवनदायिनी नहीं, बल्कि कथित तौर पर एक ‘कसाईखाना’ बन चुका है, जहाँ चंद दिनों के भीतर दो बेकसूर महिलाओं को मौत की नींद सुला दिया गया। आरोप है कि अस्पताल का संचालक सिर्फ नोट छापने की हवस में अंधा हो चुका है और यहाँ दो परिवारों की बर्बादी की कीमत पर ‘मैनेजमेंट का खूनी खेल’ खेला जा रहा है।
गुनाह नंबर 1: 22 साल की ज्योति चौधरी को निगल गया ‘सिस्टम’

अभी कुछ ही दिन बीते हैं जब इस तथाकथित अस्पताल के बाहर लाश रखकर भारी हंगामा किया गया था। जिला अस्पताल से रेफर होने के बाद 22 वर्षीय गर्भवती महिला ज्योति चौधरी को इस उम्मीद में यहाँ भर्ती कराया गया था कि निजी अस्पताल में बेहतर इलाज मिलेगा। लेकिन तीमारदारों को क्या पता था कि वे अपनी बेटी को सीधे मौत के मुंह में धकेल रहे हैं।
2 लाख की बेरहम वसूली: मृत शिशु को बाहर निकालने के नाम पर डरे-सहमे परिवार से 2 लाख रुपये ऐंठ लिए गए।
रेफर करने में जानबूझकर देरी: हालत लगातार बिगड़ने के बावजूद अस्पताल प्रबंधन परिजनों को झूठा दिलासा देता रहा ताकि मीटर घूमता रहे। जब पानी सिर से ऊपर चला गया, तब बिलासपुर सिम्स रेफर किया गया, जहाँ इलाज के दौरान ज्योति ने दम तोड़ दिया।
इस मौत के बाद भड़के जनआक्रोश ने गौरेला-पेंड्रा मुख्य मार्ग पर घंटों चक्काजाम कर अस्पताल को बंद करने की मांग की थी।

गुनाह नंबर 2: लीलावती की मौत; 14 दिन के मासूम के सिर से उठा माँ का साया
ज्योति की चिता की आग ठंडी भी नहीं हुई थी कि जिल्दा निवासी लीलावती आर्मो की मौत ने इस अस्पताल के काले कारनामों की पोल फिर खोल दी। डिलीवरी के बाद लीलावती तड़पती रही, और अस्पताल के संचालक का ‘कैश काउंटर’ चलता रहा।
मृतका के पति आनंद सिंह आर्मो का कलेजा चीर देने वाला बयान: “हमसे इलाज के नाम पर डेढ़ लाख से अधिक रुपये जमा करवाए गए। हमने कर्ज लेकर अस्पताल की मांग पूरी की। जब मेरी पत्नी की हालत बिगड़ने लगी और हमने उसे किसी बड़े अस्पताल ले जाने की भीख मांगी, तो अस्पताल प्रबंधन ने अपनी चमड़ी बचाने के लिए हमसे जबरन बॉण्ड पेपर पर दस्तखत करवा लिए और हमें घर भेज दिया।”
घर पहुँचते ही जब लीलावती की हालत मरणासन्न हुई, तो उसे जिला अस्पताल ले जाया गया, जहाँ भर्ती होने के महज 30 मिनट के भीतर उसने दम तोड़ दिया। इस दर्दनाक घटना का सबसे क्रूर पहलू यह है कि लीलावती अपने पीछे सिर्फ 14 दिन का नवजात शिशु छोड़ गई है, जिसकी ममता को इस लालची अस्पताल ने हमेशा के लिए छीन लिया।

जनता के वो सुलगते सवाल, जिनका जवाब इस ‘मौत के सौदागर’ को देना होगा:
मरीजों को बंधक क्यों बनाया? अगर तीमारदार मरीजों को ले जाना चाहते थे, तो उन्हें समय रहते हायर सेंटर क्यों नहीं भेजा गया? क्या सिर्फ़ जेबें गर्म करने के लिए उन्हें रोक कर रखा गया?
लाखों की डकैती क्यों? जब अस्पताल में गंभीर मरीजों को बचाने की बात नहीं थी, तो इलाज के नाम पर लाखों रुपये क्यों ऐंठे गए?
बॉण्ड पेपर का खेल क्यों? अपनी कानूनी गर्दन बचाने के लिए मरणासन्न मरीज के परिजनों से जबरन बॉण्ड पेपर पर दस्तखत क्यों करवाए गए? क्या यह हत्या को छुपाने की सोची-समझी साजिश नहीं है?
इलाके में भारी आक्रोश, अब आर-पार की लड़ाई की चेतावनी
इन लगातार हो रही मौतों ने क्षेत्र के ग्रामीणों, सामाजिक संगठनों और आम जनता के सब्र का बांध तोड़ दिया है। लोग अब सड़कों पर उतर आए हैं और इस ‘डेथ फैक्टरी’ के संचालक के खिलाफ सीधे हत्या का मुकदमा दर्ज करने की मांग कर रहे हैं। प्रदर्शनकारियों ने दो टूक चेतावनी दी है कि यदि इस बार भी प्रशासनिक साठगांठ या रसूख के दम पर मामले को दबाने की कोशिश की गई, तो उग्र आंदोलन होगा जिसकी जिम्मेदारी शासन की होगी।
बड़ा सवाल: दो हंसते-खेलते परिवार तबाह हो गए, एक मासूम बच्चा अपनी माँ की गोद के लिए बिलख रहा है… क्या इस बार इस ‘मौत के सौदागर’ पर शिकंजा कसा जाएगा या फिर जांच और आश्वसनों के सरकारी खेल में यह खूनी सच भी दफन हो जाएगा?









